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Tuesday, 21 July 2020

What is naad ?

नाद 

प्रसिद्ध ग्रंथ संगीतरत्नाकर के अनुसार नाद की व्याख्या निम्नलिखित है।


नकारं प्रांणमामानं दकारमनलं बिंदु:।
जात: प्राणअग्नि संयोगातेनम नदोभिधीयते ।। 

अर्थ

"नकार" प्राण वाचक है तथा दकार अग्नि वचाक है अर्थात जो अग्नि और वायु के योग से उत्पन्न हुआ हो ,उसे नाद कहते है ।


आहोतीनहतश्चेती द्विधा नादो निग्ध्य्ते
सोय प्रकाशते पिंडे तस्तात पिंडो भिधियते 



अर्थ
नाद के दो प्रकार है - 

१) आहत 
२) अनाहत

ये दोनो देह (पिंड) में प्रकट होते है ।



1. आहत नाद -  जो नाद दो वस्तुओं के मिलने से अर्थात टकराने या रगड़ से उत्पन्ना होता है ।जो कानो से सुनाई देता है ।यानी हम दिन भी जो भी सुनते है वो यही नाद है, जेसे किसी कोई भी संगीत हो ,धुन हो ,गाड़ियों की आवाज़ ,आपके बोलने की आवाज़ ,पंखे या मोटर चलने की आवाज़ ,आदि .
यह नाद वर्तमान विज्ञानिक नियमो के अंतर्गत है 
और इस नाद को हवा चाहिए प्रवाहित होने कि लिए ।




2. अनाहत नाद - यह नाद केवल अनुभव किया जाता है ,इससे आप अपने कानो से नहीं सुन सकते क्यूँकि इसके उत्पन्न होने का कोई राज नहीं है ।यह नाद स्वयंभू रूप से प्रकट होता है और हर जगह मौजूद है ।


               यह नाद वर्तमान विज्ञानिक सीमाओं से परे है । 
               इसे केवल सिद्ध या ऋषि मुनि ही सुन सकते है।